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वर्ड्स ब्रिज में आज रत्नकुमार सांभरिया की कहानी लाठी

 

द वर्ड्स ब्रिज 

संपादक- डॉ. राजकुमारी राजसी                    devsakshipublication@gmail.com 

 

कहानी- लाठी

रत्‍नकुमार सांभरिया

 ट्रांसफार्मर फुंक गया। पिछले दो दिनों से बिजली नहीं आई थी, गाँव में। भादो की सड़ी गर्मी पड़ रही थी। बदन-बदन बास। साँस-साँस हाँफ। बीजणे (हाथ पँखा) चलाते लोगों के हाथ रह गए थे। सूरज नीचे उतर गया था। अमावस का धुँधलका पाँव पसार रहा था। बसेरों में लौट आए पाँखियों की चहचहाटें थम गई थीं। दरख्त साध खड़े संत से शाँत थे।

     चाँद मोहम्मद मीरासी बगल में भारी-भरकम ढोल लटकाए, हाथ में डँका लिए थका-माँदा घर लौटा। ढिबरी की कँपकँपाती लौ में सलमा भय के कुँड में डूबी बैठी थी। अपनी बीवी की आँखों में खौफ़ की खसें देखकर उसके हाथ-पाँव फूल गए थे। ढोल खूँटी से टाँगते नहीं बना उससे। उसने ढोल नीचे रखा और डँका उसकी खींचों में खोंस दिया।

     चाँद मोहम्मद बारह किताब पढ़ा, तीस-इकतीस के दरमियान था। उठा क़द, गेहुँआ रंग। कमाया हुआ शरीर। चेहरे पर चॉपनुमा दाढ़ी। कतरी-सँवरी मूँछें। नीचा-सा कुरता और ओछा-सा पाजामा पहने था। सिर पर जरी की टोपी थी, उसके दादाजान के हाथ की। वह ढोल बजाने जाता, आशीर्वाद की तरह टोपी अपने सिर पर जरूर रखता, जैसे उसके अब्बाजान रखा करते थे।

     वह पाजामा के पाँयचे सँगवाकर सलमा के पास बैठ गया, उकडूं। उसने टोपी उतारकर खाट पर रख दी।

     छब्बीस-सत्ताईस की सलमा की देह पतली-दुबली थी। छोटी काठी। गोरा रंग। मुँह पर चेचक के कोई-कोई कण। ढले सुते पतले से चेहरे पर तोते की चोंच जैसी खड़ी नाक में सोने की रिंगनुमा नथ। कानों में चाँदी के कँधे छूते लम्बे-लम्बे झुमके। वह हमेशा छींट के ढीले-ढाले सलवार जम्फर पहने रहती। गाँव में घूँघट नहीं बनाती थी, घर से निकलती, उसकी नजरें धरती में रहतीं।

     सलमा डरी-सहमी बैठी थी। उसने एक दोस्त की तरह अपने शौहर के कँधे पर हाथ रखा। उसका शरीर धरती कँप की तरह धूजने लगा था, आँखों में आई वह कहने लगी-‘‘पड़ोसी जालिम हैं। हमारी जान लेने पर उतर आए।’’

     चाँद मोहम्मद हैरत से असहज हुआ-‘‘सलमा!’’

     ‘‘दो लाठियाँ खरीद कर लाए हैं, अभी-अभी। मेरी आँखों के सामने।’’ घबराई हुई सलमा ने आँखें टिमटिमाईं।

     चाँद मोहम्मद ने विचलन से माथा सिकोड़ा-‘‘हरमन चचा की कह रही है, तू?’’

     सलमा की आँखों की कोरों पर भय के साये थे। उसकी आवाज़ घरघराई-‘‘हाँ।’’

     सुबह हुई मामूली-सी रार चाँद मोहम्मद के जेहन में झाड़-सी उग गई। वह अपनी गाय को जोहड़ पिलाने जा रहा था। गाय को एक कसूती बान पड़ी हुई थी। वह जब भी घर से निकलती हरमन के दुआर के सामने खड़ी होकर मूतती। गाय ने आज भी……….. उसे वहाँ से हटाने के लिए चाँद मोहम्मद ने ज़मीन पर खूब संटी मारीं। हट-हट की हटकारें दीं। गाय, गाय थी। वह टस से मस नहीं हुई।

     हरमन लाल पचपन के आँकड़े थे। हट्टी-कट्टी काया। कानों से लाचार। सौ सनकियों के एक सनकी। रोज़-रोज़ उनके दुआर के सामने गाय के पेशाब करने को वे चाँद मोहम्मद की जेहानी खुराफात मानते थे। गाय को मूतते देख, वे क्रोध से उबलते राह में आ खड़े हुए। उन्होंने बेअदबी से चाँद मोहम्मद को दो-चार जली-कटी सुनाई। उसकी संटी छीन ली और हवा में हाथ उठाया-‘‘हम बेवकूफ हैं, जो रोज………….।’’

     चाँद मोहम्मद गुस्से और बेइज़्ज़़ती से काँपने लगा था। ताकीद की-‘‘चचाजान अपनी ताईं रहो। मैं मजबूर हो जाऊँ। गाय है। रास्ता है। मूत दिया, मूत दिया।’’

     हरमन चुपचाप अपने नौहरे में चले गए। चाँद अपनी गाय को लेकर आगे बढ़ गया। बात आई-गई हो गई थी, एक मिजान से।

     चाँद मोहम्मद ने अतीत याद कर विश्वास भरी गर्दन हिलाई-‘‘सलमा हरमन चचा हमारे ऊपर लाठी नहीं ला सकते। नहीं ला सकते। उन्होंने बहुत लड़ियाया है, मुझे।’’ एकाएक वह भावुक हो गया-‘‘वे लाठी नहीं ला सकते, सलमा।’’

     चाँद मोहम्मद के दिमाग में एक बात बदली-सी उमड़ी। गाँव में जब भी दस-बीस लोग चौपाल पर जुड़ते हैं। सैंतालीस के हिंदू-मुस्लिम दंगों की बात होती है। हरमन चचा उसे बाँहों में भरकर किस्सा सुनाने बैठ जाते हैं ‘उन दिनों दो कौमों के मन में मजहब का ज़हर घुल गया था। दोनों थोक एक-दूसरे के लिए मौत के साए थे। चारों ओर मार-काट मची थी। अपनी-अपनी जान बचाने की खातिर भागम भाग थी। मेरे बापू ने मवालियों के तलवार-भालों का खुद सामना करके चाँद के दादाजान ताज मोहम्मद और अब्बाजान राज मोहम्मद की जान बचाई थी। उन्हें गाँव से हरगिज नहीं जाने दिया।’

     चाँद ने द्रोपदी के चीर से भी ज्यादा लम्बी साँस मारी-‘‘सलमा, यक़ीन नहीं होता।’’

     सलमा चिनकी-‘‘झूठी हूँ न, मैं?’’       

     चाँद मोहम्मद ने सलमा की ओर सवालियाँ नजरों से देखकर, अपनी बात दोहराई-‘‘सलमा, सच में यक़ीन नहीं होता। मैं छत पर जाकर देखता हूँ।’’ उसका सारा बदन पसीने नहाया था।

     सलमा ने उसे टोका-‘‘नहीं, तुम मत जाओ छत पर, दीन को भेज दो।’’

     चाँद मोहम्मद का लड़का दीन मोहम्मद सातेक साल का था। माँ-सा गोरा। बाप-सा गठीला। वह कमरे में बैठा चिमनी की रोशनी तले कायदा पढ़ रहा था।

     चाँद मोहम्मद ने लड़के को अपने नज़दीक बुलाकर कहा-‘‘दीन, छत पर जा कर देख, हरमन दादा के चौक में लाठियाँ पड़ी हैं, क्या?’’

     दीन मोहम्मद के हाथ में कलम और कायदा थे। वह उन्हें आले में रखकर सीढ़ियाँ चढ़ता छत पर चला गया। छत से उतरकर उसने चाँद मोहम्मद को बताया-‘‘हाँ अब्बाजान, दो लाठियाँ हैं, एकदम नईं। एक लाठी दादाजान लिए बैठे हैं, दूसरी पड़ी है। दादाजान के हाथ में लालटेन है।’’

     चाँद मोहम्मद अनहोनी के डर से सहमा।

     ‘शौहर को अपनी बीवी की बात पर यकीन नहीं है।’’ सलमा ने चाँद को आँखों ही आँखों खूब झिड़का।

     एक अप्रत्याशित खतरे की आशंका के मद्देनज़र चाँद मोहम्मद ने सलमा से कहा-‘‘दीन को रोटी खिला दे। खुद खा ले। मेरी भूख मर गई।’’

     सलमा ने दीन मोहम्मद को रोटी खिलाकर जल्दी सुला दिया। जब चाँद ने एक कोर तक नहीं तोड़ा, सलमा का मन भी नहीं हुआ, रोटी खाए।

     पूरे खम के साथ हरमन की लाठी ज़मीन पर पड़ी। चाँद मोहम्मद और सलमा दोनों भीतर तक हिल गए। सलमा सहमी-‘‘सच उनके इरादे नेक नहीं है। लाठी ज़मीन पर मार कर सोचते होंगे, चाँद मोहम्मद बाहर निकल आएगा। वे लाठी पीटें, तुम बाहर मत निकलना। उनको गुस्सा के दौरे पड़ते हैं। एक बार उनका पाड़ा खूँटा तुड़ाकर भैंस के थन लबड़ रहा था। उन्होंने पाड़े को पीट-पीटकर मार डाला और खींच कर नाले में पटक आये।

     ‘चाँद मोहम्मद ने कहा-‘‘धीरे बोल, हरमन सुन लेंगे।’

     सलमा ने तरफ़दारी से कहा-‘‘एकदम बहरे हैं, सिल से। साँप को सुने, उनको सुने।’’

     चाँद मोहम्मद ने मन में आई मुद्दई बात का सिरा पकड़कर निःश्वास छोड़ी-‘‘मेरे ख्याल से मसला गाय के मूतने का नहीं है, सलमा। गाँव में आज कितने घर गायें बँधी हैं। गाय को पाक (पवित्र) मानते हैं। माता कहते हैं। मावस के दिन गाँव में दूसरे घरों से भी लोग हमारी गाय को माँडी (पहली सिंकी पवित्र रोटी और खीर) देने आते हैं।’’

     सलमा बोली-‘‘वो तो है।’’

     चाँद मोहम्मद कहने लगा-‘‘गाँठ है, सलमा। जब से बावरी मस्जिद का मसला उठा है, दो मजहबों में दरार पैदा हो गई है। मुल्क के नेताओं का सवारथ दो कौमों के भाईचारे का गला रेत रहा है। फिरकापरस्ती के पैर गाँवों तक आ गए हैं। आसपास के दस-बीस गाँवों में एक हमारा घर है, मुसलमान का। एक समय रोटी रूस्तम थी, हरमन चचा के लिए। आज दो पैसे हाथ में हो गए हैं न, धर्म के गुण गाते हैं।’’

     ‘हूँ’ कहकर सलमा तिलमिलाई-‘‘हमारी शोहरत उनकी आँख में रड़कने लगी है।’’

     चाँद मोहम्मद धर्मनिरपेक्ष ही नहीं, जातिनिरपेक्ष भी था। वह जाम-जामना, भात-छूछक, ब्याह-शादी जैसे मुबारक मौकों पर हर घर ढोल बजाने जाता। छत्तीसों जात का अन्न-जल, खाता-पीता। उसने लम्बी साँस खींच कर साँस छोड़ी-‘‘कल घर-घर जाकर बताऊँगा, हरमन के मन का मैल।’’ चाँद मोहम्मद ने खाट पर पड़े गमछे से माथे का पसीना पोंछ कर उसे फिर खाट पर पटक दिया था।

     सलमा ने गीली नाक सुड़सुड़ाई।

     चाँद मोहम्मद ने मुट्ठियाँ भाँजी-‘‘सलमा, मैं भी सच्चा शख्स हूँ। धर्म के परचम से हरगिज नहीं डरूँगा। मेरे बाप-दादा की देहरी है। गाँव को बड़ा करने में हमारा भी उतना ही हाथ है, जितना हरमन चचा का। मैंने ही आड़े वक्त उनकी मदद की होगी, मुझ पर उनका कोई अहसान नहीं है। आज मैं जहाँ हूँ, अपनी मेहनत और जेहानत से हूँ।’’

     चाँद मोहम्मद ने घड़ी की ओर देखा। रात दस बज गए थे।

     खौफजदा को अँधेरे का इतना खौफ़ नहीं होता, जितना चाँदने का होता है। प्रकाश में वह छोटे-छोटे कीट पतंगों से ही भयभीत नहीं होता, खुद की छाया के डर से भी डरने लगता है। चाँद मोहम्मद उठा। किवाड़ भिड़ाकर ठीक से बन्द किए। साँकल लगाई। वह ढिबरी बुझाकर नीचे बैठ गया।

     सलमा ने चाँद को बाँहों में भर लिया, मानो भय काट रहा हो। उसका कंठ थरथराया-‘‘पड़ोसी-सा सगा नहीं, पड़ोसी-सा दगा नहीं। आज की रात न जाने कैसे कटेगी।’’

     चाँद मोहम्मद बोला-‘‘डर मत सलमा, मैं हूँ।’’

     सलमा ने कस कर आँखें मीच लीं-‘‘मुझे मुर्दे से बैठे नज़र आ रहे हैं, अँधेरे में।’’

     चाँद मोहम्मद ने उसके कँधे पर हाथ धरा-‘‘अगर हमारे मुकद्दर में यही वदा है। आई मौत को खुदा भी नहीं टाल सकता, सलमा।’’

     हरमन लाल और चाँद मोहम्मद के बीच चौक पत्थरों की डोली खड़ी हुई थी। सीना सवानी। डोली आड़ भी। डोली निशानदेह भी। पुरानी डोली थी। पत्थर खड़े थे। हरमन का घर दूसरी गली में था। यह उनका घर नहीं, नौहरा था। भैंसें बँधती थीं। हरमन ने लालटेन लेकर डोली उकस कर चाँद मोहम्मद के चौक की ओर देखा।

     चाँद मोहम्मद ने पिछले दिनों ही कच्चे छप्पर हटाकर पक्के दो कमरे खड़े किये थे। हाथ तंग था, पुराने किवाड़ जुड़वा लिए। जुगाड़ बैठेगा, नए जुड़वा लेंगे। नीम अँधेरा था। किवाड़ों की झिर्रियों से लालटेन की रोशनी भीतर आई।

     खौफ़नाक मंजर। चाँद मोहम्मद आतंकित हो उठा। बीवी को बच्चे की तरह छाती से चिपका कर वह कहने लगा-‘‘सच सलमा, उन पर वहशीपन है। वे लालटेन लेकर मौका मुआयना कर रहे हैं। कयामत आएगी।’’

     सलमा के आँसुओं से चाँद मोहम्मद का सीना गीला हो गया। घिग्घी बँध गई उसकी। रुलाई रोकते उसके होंठ बुदबुदाये-‘‘कितनी बार रोई हूँ। एक लाठी खरीद लाओ। वक़्त काम आएगी। कहूँ, तुम्हारी अकल पर तो पत्थर पड़े हैं।’’

वह एक साँस ठहरकर फिर चिनकी-‘‘परसों की तो बात है। अपने घर में बावला कुत्ता आ घुसा, उन्हीं से लाठी लेकर उसे घेरा था।’’

     चाँद मोहम्मद ने उसे सीने से हटाया-‘‘जुल्म की यह रात निकल जाए। कल एक लाठी तो खरीदकर लाऊँगा ही, बाँस में फरसा भी ठुकवा लूँगा। हथियार की हथियार से हिफाज़त होती है।’’

     हरमन ने लालटेन स्टूल पर रखकर दो तीन लाठियाँ एक साथ जमीन पर मारीं। चाँद मोहम्मद और सलमा की साँसें ठहर गईं। भय के दबाव जिगर बाहर आ गिरने को थे उनके। सलमा चाँद मोहम्मद से चिपक गई थी, कड़ी।

     चाँद मोहम्मद डर से फुसफुसाया-‘‘सलमा हरमन इतनी लाठी मारे जा रहे हैं, गाँव में कोई भी तो नहीं जागता।’’

     सलमा ने कहा-‘‘गाँव है, बहुत तड़के उठ खड़ा होता है न, साँझ पड़े सो जाता है, गहरा।’’

     चाँद मोहम्मद छोटी-सी हुँकारी भरकर चुप हो गया। उसने अँगुलियों से माथे का पसीना खींचकर नीचे छींट दिया।

     सलमा की फिक्र ने फन निकाला-‘‘अपने तो किवाड़ भी पुराने हैं।’’

     चाँद मोहम्मद ने उसकी हिम्मत बँधाई-‘‘नहीं सलमा, ऐसी बात नहीं है। यह किवाड़ मेरे बापू के हाथ के हैं। इतने कमजोर नहीं हैं कि सहज ही टूट-बिखर जाएँगे, हरमन से।’’

     सलमा ने अपनी एक चिंता और रखी-‘‘डॉस (मच्छर) उनकी भैंसों को काटते हैं। वे तूड़ी की ढेरी पर मिट्टी का तेल डालकर धुआंते रहते हैं। उनके नौहरे में तेल की पीपी भरी पड़ी है।’’ सलमा से कहते नहीं बना, वे तेल छिड़क कर हमें आग लगा देंगे।

     चाँद मोहम्मद ने बात पकड़ ली-‘‘मैं उन्हें गोली मार दूँगा।’’ शब्द चाँद मोहम्मद के होंठों की देहरी लांघकर निकले थे। सलमा क्षुब्ध हुई-‘‘घर में डंडा है नहीं, गोली मार दोगे।’’

     चाँद ने सलमा की चिंता को कम करने की चेष्टा की-‘‘सलमा, जैसे ही वे डोली कूदेंगे, मैं ढोल पीटना शुरू कर दूँगा। गाँव इकट्ठा हो जाएगा, देखते ही देखते।’’

     ‘‘ढोल बजाओगे तब तक सब जल-फुंक जाएगा।’’ सलमा के भीतर धुकधुकी छूटी।

     ‘‘मैं बाहर जाकर पानी का मटका उठा लाता हूँ। वे मिट्टी का तेल छिड़केंगे। मैं पानी से बहा दूँगा उसे। आग नहीं पकड़ेगी। बस फिर इतनी तेज ढोल बजाऊँगा, सारा गाँव उन्हें थूकेगा।’’

     सलमा के मस्तिष्क में पड़ी दस साल पहले की बात चिड़िया-सी चहकी। वह निकाह कर देहरी आई थी। हरमन चचा ने बेटी की तरह उसके सिर पर हाथ फेर कर पचास रुपए जुहारी में दिए थे। हँसकर कहा था-‘‘कितनी बोदी (कमजोर) है मेरी बेटी, घर कैसे सँभाल पाएगी।’’

     वह एक यक़ीन के साथ कहने लगी-‘‘नहीं-नहीं, तुम बाहर मत निकलो। तुम पर तीर बने हुए हैं। मैं जाती हूँ, मुझ पर हाथ नहीं उठेगा, उनका।’’

     चाँद मोहम्मद ने ठंडी आह ली-‘‘कितनी वफादार बीवी है।’’

     सलमा ने उठकर किवाड़ की झिर्री से डोली के पार देखा। वह किवाड़ खोलकर साँस की आहट हवा-सी पेहंडी तक गई और मटका ले, आँधी-सी लौट आई थी। मटका नीचे रखकर हाँफ रोकती वह बोली-‘‘आज भैंसें भी भीतर बाँधी हैं, उन्होंने।’’

     चाँद मोहम्मद ने धीरे से कहा-‘‘साँकल लगा कर चुपचाप बैठ जा।’’

     हरमन ने डोली उकस चाँद मोहम्मद के घर की ओर लालटेन से फिर देखा।

     अँधेरा हो, रोशनी का छोटे से छोटा कतरा भीतर चला आता है। लालटेन की रोशनी उनके किवाड़ों के छिद्रों-झिर्रियों से भीतर आई। चाँद की घबराई निगाह दीवार पर गई। बारह बजे थे। सलमा ने भी घड़ी देख ली। दोनों चुप थे। हरमन ने लालटेन के प्रकाश में चाँद मोहम्मद की दीवार की जड़ में पत्थर मारा, फिर अपने चौक की ओर लाठी ठोकी।

     चाँद मोहम्मद और सलमा भयभीत गौरैया से कोने में चिपककर बैठ गए, साँस रोके। सलमा ने भय भरे कँठ चाँद मोहम्मद के कान में धीरे से कहा-‘‘वे पत्थर फेंकने लगे हैं, हमारी ओर। समाई की भी हद होती है, आखिर। तुम कायर बैठो। मैं बजाती हूँ, ढोल।’’

     चाँद ने हाथ पकड़ कर उसे रोका-‘‘नहीं रहने दो। वे तो खब्बत हैं। हम खब्बत थोड़े न हैं। सारा गाँव जाग उठेगा। खामखाह बदनामी होगी। उन्हें इधर कूदने दो, पहले।’’

     उनकी छत की मुंडेर पर उल्लू आ बैठा। वह हू-हू-हू की डरावनी आवाजें करने लगा था। सलमा का दिल बैठने की हद तक आ पहुँचा। रुआंसी बोली-‘‘आधी रात जिसकी मुंडेर पर उल्लू आ बैठता है, उसके घर मौत आती है।’’ उसे झुरझुरी लगी।

     चाँद मोहम्मद ने उसके मुँह पर हथेली रखी-‘‘बक मत। उल्लू रात देखता जरूर है। वह मौत का काग़ज़ थोड़े न होता है।’’

     हरमन की लाठी ज़मीन पर पड़ी। उल्लू उड़ गया था। जहरीली गैस की तरह मियां-बीवी दोनों के भीतर खौफ़ भरता गया।

     हाथ में हथियार हो आसन्न खतरे का सामना करने की आदमी की हिम्मत हो जाती है। चाँद मोहम्मद उठा। पुरानी-सी एक टूटी खाट खड़ी थी। उसने धीरे-धीरे मुट्ठी की थप्पियाँ मारकर उसकी बाही (बाजू) निकाल ली। वह बाही के सिरे को अपनी हथेलियों के बीच कसकर बैठ गया था। भय और क्रोध के कारण गफलत में डूबे चाँद मोहम्मद को इतना भी होश नहीं, पुरानी लकड़ी है। फाँसें शूल सी खड़ी हैं। हथेलियों में धँसेंगी। वह कहने लगा-‘‘वह ढोल बजा कर गाँव को परेशान नहीं करेगा। हरमन चचा इधर कूदे, डटकर मुकाबला होगा।’’

     चौक में खड़ी गाय रंभाई। चाँद मोहम्मद ने पूछा-‘‘गाय भूखी है, सलमा?’’

     सलमा चिनकी-‘‘नहीं, पानी पिला दिया था। ल्हास भरी है, न्यार की।’’

     ‘‘कभी नहीं रंभाती थी ?’’

     ‘‘हरमन चचा की लाठी से डरी है।’’

     चाँद ने और गुस्सा खाया-‘‘यह बात है!’’

     ‘‘हाँ, जब भी चचा जमीन पर लाठी मारते हैं, गाय रंभाती है।’’ गाय की उस बात को लेकर सलमा मन ही मन मिनमिनाई, ‘इसी रांड ने ही उल्टे बीज बोए हैं, आज।’

     चाँद मोहम्मद ने दाँत किटकिटाये-‘‘जुल्मी रात की दहशत की यह दास्तान मेरे दिल की तख्ती पर खत गई है, सलमा।’’

     रात द्रोपदी के चीर की तरह अंतहीन हो रही थी। हरमन जब भी धरती पर लाठी मारते, चाँद मोहम्मद अपनी हथेलियों के बीच दबी बाही को और जोर से कस लेता। उसे न दर्द का अहसास था। न इस बात का गम था, बाही की फाँसें उसकी हथेली में बैठती जा रही हैं। खून टपक रहा है। उसे लग रहा था, उसके हाथों जालिम हरमन की गर्दन है, बेदम करके ही दम लेगा।

     अरुणोदय हो गया था। भीतर आ रही सूरज की सुरमई किरणें चाँद और सलमा को हरमन की लालटेन की रोशनी-सी ही लग रही थी।

     सूरज थोड़ा और चढ़ा।

     ‘‘अरे चाँद मोहम्मद बेटे, चाँद बेटे, अरे चाँद।’’ हरमन ने चाँद मोहम्मद को आवाज़ लगानी शुरू की। आवाज़ में न गुस्सा था, न कठोरता थी, न द्वेष था, न दंभ था। आवाज़ में वात्सल्य सना अपनापा था। एक ऐसा पुट, जिसमें सच्चे रिश्ते की गँध थी।

     दोनों हथेलियों के बीच बाही दबाए, चाँद मोहम्मद बदहवास बैठा था। हरमन की प्यारभरी आवाजें सुन कर सलमा ने बाहर देखा। सचमुच दिन चढ़ आया था। उसकी निगाह फर्श पर गई। फर्श पर लहू के छींटे थे। सलमा ने उसकी मुट्ठियों में दबी बाही छुड़ाने की खूब कोशिश की, उसके हाथ बाही छोड़ नहीं रहे थे। वह कहने लगी-‘‘बावले हुए हो। दिन चढ़ आया है। हरमन चचा तुम्हें बुला रहे हैं।’’

     चाँद मोहम्मद में जैसे दीर्घ कोमा के बाद चेतना लौटी। आँखें फाड़ कर पूछा-‘‘हें! दिन निकल आया?’’

     ‘‘हरमन चचा तुम्हें प्यार से बेटा-बेटा कहकर बुला रहे हैं, बाहर निकलो।’’

     ‘‘सच!’’

     ‘‘बाहर निकलो न! उन्हें कितनी देर हो गई है, आवाज़ लगाते।’’

     चाँद मोहम्मद की हथेलियों से बाही छूटकर नीचे गिर पड़ी थी। उसकी हथेलियाँ रक्त से सनी थीं। बाही का सिरा रगा हुआ था। उसने हाथ धोए। वह साँकल खोलकर कमरे से बाहर आ गया था। पाजामे की दोनों जेबों में उसके दोनों हाथ थे।

     हरमन ने चौक में खड़े चाँद मोहम्मद को अपनत्व से झिड़का-‘‘घोड़े बेचकर तुम जैसा कोई सोता है। धरती पर इतनी लाठियाँ पड़ने पर कुंभकरण जाग जाता।’’

     चाँद मोहम्मद ने देखा, हरमन चचा की आँखों में वहशत नहीं, वफादारी है। उसने पलकें झपझपाकर कर ‘हूँ’ कही।

     हरमन कहने लगे-‘‘मैंने तो तुम्हें इसलिए नहीं जगाया गाँव कमा कर आए हो। तुम्हारी नींद खराब होती।’’

     जिस प्रकार मैल भरा कपड़ा धोने से उसका मैल हट जाता है। हरमन चचा की दुलार सनी आत्मीयता से चाँद मोहम्मद और सलमा के खौफ़, क्रोध और द्वेष धुल गए थे। उनके चिंतित चेहरों पर एक जिज्ञासा उभर आई थी।

     चाँद ने नम आँखों फिर ‘हूँ’ कही।

     हरमन डोली की ओर उकसे। उन्होंने चाँद मोहम्मद के सामने लाठी फेंकी। बिल की ओर अँगुली बताकर वे बोले-‘‘चाँद बेटे, इस बिल में एक बहुत ही जहरीला साँप है। पूरी रात खराब कर दी, मरने में नहीं आ रहा।’’

     चाँद मोहम्मद को जैसे मौत ने छुआ-‘‘अंय!’’

     हरमन बोले-‘‘हाँ उसकी पूँछड़ी तुम्हारी ओर है। तुम उधर से ठोको। इधर निकलेगा, मैं कुचल दूँगा, उसे।’’

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 sambhriark@gmail.com

लेखक के बारे में

परिचय

रत्‍नकुमार सांभरिया

भाड़ावास हाउस

सी-137, महेश नगर,

जयपुर-302015 (राज.)

मो. 9636053497

sambhriark@gmai

लेखक राजस्थान साहित्य अकादमी के शीर्ष साहित्य पुरस्कार ‘मीरा सम्मान’ से पुरस्कृत है।

Comments (5)

  1. “कहानी ‘लाठी’ अत्यंत प्रभावशाली और यथार्थ से जुड़ी हुई रचना है। लेखक ने ग्राम्य जीवन की परिस्थितियों, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक परिवेश को बहुत ही सरल किंतु सशक्त शब्दों में प्रस्तुत किया है। भाषा सहज है और वर्णन शैली पाठक को बांधे रखती है। यह कहानी समाज को सोचने पर मजबूर करती है तथा साहित्यिक दृष्टि से भी उत्कृष्ट है।

  2. सदभावना को व्यक्त करती प्रसिद्ध साहित्यकार की इस कहानी को बेहतरीन कहानी को अवश्य पढ़ें

    1. प्रतिक्रिया देने के लिए आभार

      1. प्रतिक्रिया देने के लिए आभार

  3. वाकई बहुत ही अच्छी कहानी है मैंने पहली बार जिज्ञासा से किसी कहानी को पूरा पढ़ा है जब ये मन के अंधियारे मिटे जग उजियारा होय।

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