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महिला दिवस पर चयनित रचनाएँ

 

द वर्ड्स ब्रिज 

संपादक- डॉ. राजकुमारी राजसी                    devsakshipublication@gmail.com 

 

चयनित कवयित्रियां 
नीरजा बसंती
बबीता शर्मा
मधु मधुलिका
ऋतिका रश्मि
निरुपमा खरे

अहिल्या का पत्थर

कभी कभी सोचती हूँ
आखिर कितना न्यायसंगत रहा होगा
अहिल्या का पत्थर होना

क्या जम न गया होगा रुधिर
धमनियों में
और वो सब
अनुभूतियां, संवेदनाएँ
और भावनाओं का वह ज्वार भी

जब एक स्त्री ने स्वयं को
निरपराध होने पर भी
स्वीकारा होगा अपराधिनी होना

उसके भीतर की प्राणवायु भी तो
कलुषित हुई होगी
सचल देह में,
जब छल को प्रेम समझ
सौपी होगी स्वयं को!

पत्थर और देह में कितना सौतेला पन है
एक तराशा हुआ पत्थर जब देह की शक्ल लेता है
तब जीवंत हो उठता है
कही दर्शनीय तो कही पूजनीय!

और देह का पत्थर होना
संवेदनाओं का मुर्दा होना
मुर्दा होना उस मुग्धता का
जिसके आकर्षण के
वशीभूत हो
जगता है वो पौरुष
जिसका स्पर्श उसे मैला कर देता है!

ओह्ह्ह!क्या इतना जघन्य है
सौंदर्य का आकर्षण
जिसकी अपराधिनी समय दर समय
स्त्रियां ही रही!

नीरजा बसंती

कभी ना थकती औरतें 

ईश्वर नें रची हैं
ये कभी ना थकती औरतें !
जो खुद बिखरकर
सहेजती हैं घर की टूटन
भरती हैं दीवारों की दरारें
समेटती हैं बिस्तर की सिलवटें
धोती हैं उतरे कपड़ों का मैल
टांकती हैं टूटे बटन
और अपनी देह गंध में समाहित कर
तेल ,मिर्च -मसालों की गंध
बन जाती हैं अन्नपूर्णा ।
जेठ की दोपहरी में
जलते चूल्हे के संग सिकती हुई
अपने खुरदरे हाथों से
परोसती हैं स्नेह और वात्सल्य
भोजन की थाली में ।
मुँह अँधेरे चकरघिन्नी सी लगी
भूल जाती है निज भूख- प्यास
स्मरण रहता है तो
चौका लीपना ,दालान बुहारना
द्वारे पे बंधी गाय की सानी ।
अम्मा को गुड़ वाली चाय देकर
सोचती हैं
दो घडी कमर सीधी कर लें
पर तब तक साँझ का धुंधलका
ढांप लेता है
सूरज के घोड़े को,अपनी ओट में।
उतरते सूर्य नारायण को देख
हाथ में दीया-बाती लिये
घंटी बजाती ,मंदिर के आँगन में
फिर से आ जुट जाती हैं
परमेश्वर की सेवा में
ये कभी ना थकती औरतें !

              बबीता शर्मा
             कोटा (राजस्थान)

स्त्री का दर्द

हे स्त्री !
नहीं बदला कुछ भी
सतयुग से त्रेता
द्वापर से कलयुग तक ,
तारा,सीता,द्रौपदी,निर्भया तक
रही ससंकित
दुनिया तुम पर
तुम्हारे मान मर्यादा
का होता रहा हनन,,
तुम्हारे स्त्रीत्व की
अग्निपरिक्षा
युगों से
तुम मौन होकर
सहती रही हर दर्द
हर वेदना
हर जख्मों को,
तुम्हारे देह को
पूजा गया
डाली गई कुदृष्टि
सहती रही हर दुख
भिगोती रही
आंसुंओं से
खुद के पलकों को—
कभी कुल की मर्यादा
कभी स्त्री धर्म के बंधन में
जलाया खुद को,
अपने दामन बचाने
की हर संभव कोशिस
लेकिन अपने अंतस
की आग
अंतर्मन की पीड़ा
मन की गिरह
खोल न पाई
घुटती रही ताउम्र
कभी बेटी ,बहन माँ
बनकर ,,
तुम्हारे देह से ही उत्पन्न
जीवन मिलने वाले
कुछ विकृत मानव
तुम्हारे देह पर ही
गिद्ध दृष्टि
डालने की अनवरत
कोशिश करते रहे
ये धृष्ट मानव,—–
तुम जीवनदायिनी ,प्रेममय
वात्सल्य की
प्रेमरस में भिगी
मुरत हो l
हे स्त्री तुम ईश्वर की
बनायी अनुपम सुरत हो
मानव क्या
तुम ने तो मानवरूपी ईश्वर को भी
जन्म दिया ,—–
ईश्वर भी तुम्हारे चरणों में
शीश झुकाते रहे
लेकिन तुम्हारे किस्मत के
विधी -विधान को
मिटा न सके
तुम्हारे मन की
अंत: पीड़ा को
हर युग में
सदियों से तुम्हारी वेदना
तुम्हारा दुख
स्वयं ही सहना और
समझना पड़ा
हे स्त्री !
ये संसार ब्रम्हांड की सृष्टि
तुमसे है —-
फिर भी तुम्हारा दर्द
तुम्हारी मन:स्थति
तुम्हारी व्यथा
अपरमपार और असहनीय है lll

                मधु मधुलिका

उसने चाहा प्रेम

उसने चाहा प्रेम…
और खड़ी कर दी गई
अपराधियों की क़तार में,
फिर घुटती रही, कराहती रही,
मरती रही पल-पल
नितांत एकाकी,
ज़िन्दगी के तमाम उसूलों के संग।।

उसने चाहा देवों का सानिध्य…
और बना दी गई देवदासी,
फिर सहती रही, पिसती रही
और भिंगोती रही
अपने ऑंचल का कोर,
रात- रात भर दबी हुई गूंगी
लाचार सिसकियों के संग।।

उसने चाहा रूप- लावण्य
रस और सौंदर्य…
और बना दी गई नगरवधू
या फिर,
किसी चकले की महारानी।
यूँ साथ ही साथ शुरू हुआ फिर
उसके मशहूर और अभिशप्त
होने का सिलसिला!
निष्कासित कर दी गई
अपनी ही स्त्री बिरादरी से
फिर जल्द ही वो।
क्योंकि छीन लिया था
संभ्रांत महिलाओं ने उनके साथ
हाथ मिला पाने का उसका अदना सा एक हक़ भी।।

अंत में उसने चुननी चाही उदासीनता
और भरसक विमुख हो जाना चाहा
चाहने के इस फरेब से।
यक़ीनन उसने दफनानी चाही
अपनी अलामतें
कमजर्फों की इस दुनियाँ से!
फिर करार दी गई विक्षिप्त,
और लुटती रही, पिटती रही
रात की आगोश में
अपने आप से लिपटती रही सुबकती रही,
डूबती और उतराती भी रही।।

और फिर एक दिन
उसकी सारी चाहतें जाती रही…
कुछ भी ना चाहने की चाह में ना जाने
वो क्या कुछ बन गई होगी अब तक??
नदी, पर्वत, चट्टान या फिर
कोई बरगद- पीपल का पेड़???
मेरा ख़याल कहता है कि
वो किसी बियाबान में
चटख़ लाल टेशू के फूलों से लदे
किसी वृक्ष की डाल पर बैठी होगी
और जंगल में आग लगा रही होगी शायद।।

ऋतिकारश्मि

अस्तित्व

बहुत गर्व से दिखाई
आज़ उन्होंने अपनी वंशावली
देखो , ये मेरे परबाबा,
ये मेरे बाबा और ये मेरे पिता
ये मैं और ये मेरे बेटे,
पर कहां हैं वो ,जो
इन वंशजों को अपनी कोख में रखती हैं,
अपने दूध से सिंचित करती हैं,
कहां हैं वो, जो इनकी
कलाई में रक्षा सूत्र बांधती हैं,
न वो इस घर की न उस घर की
वहां कहा जाता है कि तुम इस घर की नहीं
तुम्हें तो बढ़ानी है किसी और घर की वंश बेल
जाना है किसी और घर
फिर एक दिन वो आ जाती है
उस दूसरे घर,
देती है वारिस उस घर को
पर फिर भी रहती हैं गुमनाम
यहां भी वहां भी्
                 निरुपमा खरे

Comments (1)

  1. बेहद शानदार कविताएं

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