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पुस्तक समीक्षा:
प्रेम से परे धर्म, आध्यात्म,नैतिकता और मानवीयता के भावों से लबालब है,’मैने चांद क्यों चुना’— हरिश बी शर्मा
‘मैने चांद क्यों चुना’ ममता जी का वह कहानी संग्रह जिसमें वे यह साबित करती हैं कि उन्हें अच्छे से पता है कि क्या नहीं लिखना। एक कहानीकार की यही कसौटी होती है कि उसे पता हो कि क्या नहीं लिखना।
भले ही इसे एक प्रेमकथा संग्रह कहकर प्रचारित किया जा रहा हो, लेकिन इन कहानियों का प्रेम बाजार का प्रेम नहीं, जिसे किताब पर छापकर बेचने की युक्ति लगाई गई हो। यह प्रेम निखालिस प्रेम की तरह पनपता है। एक कहानी में तो वासना के हल्के-से स्पर्श से पल्लवित होता प्रेम कुम्हला जाता है।
ममता आहुजा लेखिका-‘मैने चांद क्यों चुना’ |
आज श्रीगंगानगर में वरिष्ठ रंगकर्मी और लेखिका ममता आहूजा ‘मीत’ की कहानियों की किताब ‘मैने चांद क्यों चुना’ पर चर्चा का कार्यक्रम में मैने यह भी कहा।
और कहा कि यह संग्रह प्रेम की वर्जनाओं का सम्मान करते हुए बहुत ही मैच्योर किरदारों की कहानियों का दस्तावेज है। कहानीकार ने जितने भी पात्र रचे हैं, वे सभी निष्ठावान, निश्छल, परोपकारी और निस्वार्थी हैं।
जैसे कि सफल कहानी की विशेषता होती है, ये कहानियां भी पाठक को बांधे रखती है। कभी भी कुछ हो सकता है, जैसे कौतूहल से पाठक को बांधे रखती है। आश्चर्यजनक रूप से इन कहानियों में नायक-नायिका तो हैं, लेकिन खलनायक नहीं।
प्रेमी प्रेमिका हैं, लेकिन बदहवास नहीं। यह कहानियां लेखिका का भोगा हुआ यथार्थ भले ही नहीं हो, लेकिन एक लंबी और अनथक पीड़ादायी यात्रा के ऐसे अंश जरूर हैं, जिन्हें भोगा भले ही नहीं हो, देखा जरूर है।
कहानियों में अतिरंजना और सनसनी का कोई स्थान नहीं। सेंसर भी खूब हुई है ये कहानियां, लेकिन सेंसर करने वाली लेखिका ही है, जो तय कर चुकी है कि कितना और क्या लिखना है।
ये प्रेम कथाएं वस्तुत: प्रेम से परे धर्म, आध्यात्म,नैतिकता और मानवीयता के भावों से लबालब है, जहां प्रेम परिपक्व हो जाता है।
इन कहानियों में प्रेम स्त्री पुरुष के बीच होने पर भी छिछोरा नहीं। दैहिक नहीं।
कहानियों की दृश्य योजना इस संग्रह का सबसे मजबूत पक्ष है। पढ़ते हुए दृश्य उभर आते हैं। यह ममता जी के रंगकर्मी होने का हासिल है।
| “भले ही इसे एक प्रेमकथा संग्रह कहकर प्रचारित किया जा रहा हो, लेकिन इन कहानियों का प्रेम बाजार का प्रेम नहीं, जिसे किताब पर छापकर बेचने की युक्ति लगाई गई हो। यह प्रेम निखालिस प्रेम की तरह पनपता है। एक कहानी में तो वासना के हल्के-से स्पर्श से पल्लवित होता प्रेम कुम्हला जाता है।” हरीश बी शर्मा |
इन कहानियों में उपन्यास बनने की संभावना तो नज़र नहीं आती, लेकिन ‘कॉफी का दौर’ और ‘क्षितिज’ में मंचीय संभावनाएं हैं।
‘सफर आखिरी न था’ प्रेम में आए पूर्वाग्रह, संदेह और पजेसिवनेस का एक कोलाज सामने रखती है। तन्वी का वेणुगोपाल के लिए प्रेम प्रस्ताव उलटा पड़ जाता है और कहानी आगे बढ़ती है। सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पड़ताल करती है यह कहानी। ‘मैंने चांद क्यों चुना’ शिकायत से ज्यादा सफाई और स्वीकार का सफरनामा है। ‘ बालसखा’ कहानी में उभर कर आता है कि बचपन की स्मृतियां कोई नहीं भूलता।
‘वही…हां वही’ क्रश से जुड़ी है, जो कृष्ण होता नज़र आता है। यह आकर्षण के प्रतीकों से आगे बढ़ती कहानी है। ‘सांझ का सवेरा’ मोटीवेट करती कहानी है तो ‘कॉफी का दौर’ खुद से बात करते हुए अपने लिए कठघरों को बनाना और तोड़ना है। ‘कच्ची जमीन, पक्का आसमान’ अनुभूतियों की अदभुत मिसाल है। मां का अस्तित्व संजीवनी बनकर सामने आया है।
‘क्षितिज’ कहानी जाने हुए सच को उकेरते हुआ आगे बढ़ती है। ट्रीटमेंट गजब का। ‘सांझ का सवेरा’ रहस्य और कौतूहल लिए आगे बढ़ती है। कचौरी और कैलिपर्स का प्रयोग कहानी की जान है।
और ‘गुड़’ कहानी खोज में निकले किसी बुद्ध के जीवन का यथार्थ समझकर वापस घर लौटने को कहानी है, जहां पीड़ाओं की दबाने के अपने जतन हैं। जीने के अपने-अपने प्रयत्न हैं।
यह कहानियां पाठक को अपनी खोज में खुद निकलने का न सिर्फ अवसर देती है बल्कि बार बार उकसाती भी है कि जो रखा हुआ है, उसे तुम क्यों नहीं बोलते। इस तरह कहानियों में पाठक भी कई बार एक पात्र बना नजर आता है।
पाठक और कहानीकार के बीच में सदा एक रेस चलती रहती है। हर कहानी को पढ़ते हुए पाठक अंत का आकलन करता है, लेकिन वह नहीं चाहता कि उसका सोचा हुआ अंत हो। अंत में वह हो, जो उसे नयापन दे।
यह सब तो कहा ही, इनके अलावा भी बहुत कुछ निकल आया जो अब स्मृति में वापस नहीं आ रहा।
श्रीगंगानगर के वामा लेखनी मंच का यह कार्यक्रम वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.मंगत बादल की अध्यक्षता में हुआ। प्रसिद्ध कहानीकार सुरेन्द्र सुंदरम, वरिष्ठ उद्घोषक और विचारक राजेश चड्ढा, शिक्षाविद् डॉ.मधु वर्मा, सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर अरुण खामख्वाह ने भी कहानी पर विचार रखे। ममता मीत ने अपनी रचना प्रक्रिया साझा की। प्रारंभ में डॉ.बबीता काजल ने कार्यक्रम की रूपरेखा बताई। संचालन मीनाक्षी आहूजा ने किया।
पहले दिन बीकानेर में और दूसरे दिन श्रीगंगानगर में कहानी पर आधारित कार्यक्रम ने व्यक्तिगत रूप से मुझे काफी समृद्ध किया। श्रीगंगानगर की साहित्य के प्रति चेतना मुझे भाती है। यहां से साथियों से मिलना सुखद रहा। होतेंद्र जी और वैभव का खास आभार।
Hariish B. Sharmaशुरुआत का संकेत देता है।
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